Tuesday, February 17, 2015

बासंती चोले की मुकम्मल कहानी।

इस देश मे भगत के बिना न तो कोई बासंती चोला मुकम्मल होगा और ना ही उसकी कहानी। इंकलाब की इस बेमिसाल दास्तां को अभी तक उन लोगो द्वारा कलमबद्ध किया गया है जिनके हाथों में ब्रिटिश सत्ता का हस्तांतरण हुआ और उन लोगो ने इंकलाब की उस पेशकश को स्वतंत्रता आंदोलन की "महज़ एक कवायद" में समेटने की शाजिस की है।

भगत खेतों में बंदूक तक बो देने तक की साहस और संकल्पना के साथ जवान हुआ था। भगत किसानी कौम की साझी विरासत की वो किताब है जिसका मूल्यांकन होना अभी बाकी है। आंतरिक और वाह्य दोनों मोर्चे पर सत्ता के खिलाफ , जुर्म और शोषण के खिलाफ बगावत की ये वो दास्तान है जो अभी तक ठीक से पढी नही गई। इतिहासकारों की बेईमान कलम बेशकीमती हीरे पर चांदी की कलई (पॉलिश) चढ़ाने का काम की है। इसमें राष्ट्रवाद की चमक तो दिखती है लेकिन राष्ट्रप्रेम की कांति को छुपा दी गयी ताकी ब्रिटिश हुकूमत के बाद बने सत्ता के नए प्रतिष्ठानों को कोई दिक्कत न होने पाए।

आज जब किसानी कौमे आत्महत्या तक करने को मजबूर हो चुकी है तो ऐसे में इतिहास के उन तमाम संदर्भो को फिर से खंगालने का मन कर रहा है जो भगत से जुड़ी है। हूकूमत जब बहरी हो गयी तो भगत ने उन बहरो को अपनी बात सुनाने के लिए असेम्बली में बम फेंक दिया और आज तो हूकूमत न सिर्फ बहरी है बल्कि अंधी भी हो चुकी है, अब जरूरत आन पड़ी है की बगावत के उस बिगुल को फिर से आवाज दिया जाय क्यो की भगत ने कहा था की ये मेरा प्रतिरोध संगीनों, बंदूको की संस्कृति का हिस्सा नही है बल्कि जुर्म के खिलाफ कभी न मरने वाली इंकलाब है।

इंकलाब जिंदाबाद.... Long live revolution.
#आदिकिसान

No comments:

Post a Comment